ADVERTISEMENT
Invest Smart Ad

Right Ad Space

SHRI DURGA SAPTSHATI

एकादश अध्याय

EKADASH ADHYAY (Page 1)

ध्यानम्

ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।

स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्
ध्यान:
॥ श्रीदुर्गासप्तशती - एकादशोऽध्यायः ॥
देवताओं द्वारा देवी की सतुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान

॥ ध्यानम् ॥
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।

स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥

"ॐ" ऋषिरुवाच ॥1॥

॥ एकादशोऽध्यायः ॥
देवताओं द्वारा देवी की सतुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान

॥ ध्यान ॥
मैं भुवनेश्वरी देवीका ध्यान करता (करती) हूँ। उनके श्रीअङ्गों की आभा प्रभातकालके सूर्यके समान है और मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट है। वे उभरे हुए स्तनों और तीन नेत्रोंसे युक्त हैं। उनके मुखपर मुसकानकी छटा छायी रहती है और हाथोंमें वरद, अङ्कुश, पाश एवं अभय मुद्रा शोभा पाते हैं।

ऋषि कहते हैं - ॥1॥
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे

सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्।

कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्*

विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः* ॥2॥

देवीके द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भके मारे जानेपर इन्द्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवीकी स्तुति करने लगे। उस समय अभीष्टकी प्राप्ति होनेसे उनके मुखकमल दमक उठे थे और उनके प्रकाशसे दिशाएँ भी जगमगा उठी थीं ॥2॥
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद

प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।

प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं

त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥3॥

देवता बोले - शरणागतकी पीड़ा दूर करनेवाली देवि! हमपर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत्की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! विश्वकी रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत्‌की अधीश्वरी हो ॥3॥
आधारभूता जगतस्त्वमेका

महीस्वरूपेण यतः स्थितासि।

अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत-

दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥4॥

तुम इस जगत्का एकमात्र आधार हो; क्योंकि पृथ्वीरूपमें तुम्हारी ही स्थिति है। देवि! तुम्हारा पराक्रम अलङ्घनीय है। तुम्हीं जलरूपमें स्थित होकर सम्पूर्ण जगत्‌को तृप्त करती हो ॥4॥
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या

विश्वस्य बीजं परमासि माया।

सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्

त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥5॥

तुम अनन्त बलसम्पन्न वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्वकी कारणभूता परा माया हो। देवि! तुमने इस समस्त जगत्को मोहित कर रखा है। तुम्हीं प्रसन्न होनेपर इस पृथ्वीपर मोक्षकी प्राप्ति कराती हो ॥5॥
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः

स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।

त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्

का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥6॥

देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत्में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्वको व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थोंसे परे एवं परा वाणी हो ॥6॥
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्ति*प्रदायिनी।

त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥7॥

जब तुम सर्वस्वरूपा देवी स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हो, तब इसी रूपमें तुम्हारी स्तुति हो गयी। तुम्हारी स्तुतिके लिये इससे अच्छी उक्तियाँ और क्या हो सकती हैं? ॥7॥

© 2026 Durga Saptshati Pallabhav Technosoft. All Rights Reserved.